كتاب · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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المؤلف: प्रेमचंद
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मैं भी पीछे निकला और जाकर मिठाई बाँटने में प्रकाश बाबू की मदद
करना चाहा; पर उन्होंने थाल हटाकर कहा-आप रहने दीजिए,मैं अभी बाँटे
डालता हूँ। अब रह ही कितनी गयी है। मैं खिसियाकर डाकखाने की तरफ चला
कि विक्रम मुसकराता हुआ साइकिल पर आ पहुँचा। उसे देखते ही सभी जैसे
पागल हो गये। दोनों ठाकुर सामने ही खड़े थे। दोनों बाज की तरह झपटे।
प्रकाश के थाल में थोड़ी-सी मिठाई बच रही थी। उसने थाल जमीन पर पटका
और दौड़ा। और मैंने तो उस उन्माद में विक्रम को गोद में उठा लिया;
मगर कोई उससे कुछ पूछता नहीं, सभी जयजयकार की हाँक लगा रहे हैं।
बड़े ठाकुर ने आकाश की ओर देखा-बोलो राजारामचन्द्र की जय!
छोटे ठाकुर ने छलाँग मारी-बोलो हनुमानजी की जय!
प्रकाश तालियाँ बजाता हुआ चीखा-दुहाई झक्कड़ बाबा की!
विक्रम ने और जोर से कहकहा मारा--फिर अलग खड़ा होकर बोला--जिसका नाम
आया है, उससे एक लाख लॅूगा। बोलो है मंजूर?
बड़े ठाकुर ने उसका हाथ पकड़ा-पहले बता तो!
'ना! यों नहीं बताता।
छोटे ठाकुर बिगड़े-महज बताने के लिए एक लाख? शाबाश!
प्रकाश ने भी त्योरी चढ़ायीं-क्या डाकखाना हमने देखा नहीं है है?
'अच्छा तो अपना-अपना नाम सुनने के लिए तैयार हो जाओ।"
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