كتاب · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
صفحة 142 من 251
المؤلف: प्रेमचंद
الوقت0:00
السرعة (WPM)0.0
الدقة100.0%
اضغط ابدأ واكتب السطور بدقة. · مفتاح الرجوع معطل — استمر حتى بعد الخطأ.
माताजी ने केवल इतना कहा-सभों ने बेईमानी की है। मै कभी मानने की
नहीं। हमारे देवता क्या करें! किसी के हाथ से थोड़े ही छीन लायेगे।
रात को किसी ने खाना नहीं खाया। मैं भी उदास बैठा हुआ था कि विक्रम
आकर बोला-चलो होटल से कुछ खा आयें। घर में तो चूल्हा नहीं जला।
मैने पूछा-तुम डाकखाने से आये, तो बहुत प्रसन्न क्यों थे?
उसने कहा-जब मैने डाकखाने के सामने हजारों की भीड़ देखी, तो मुझे
अपने लोगों के गधेपन पर हँसी आयी। एक शहर में जब इतने आदमी हैं, तो
सारे हिन्दस्तान में इसके हजार गुने से कम न होंगे और दुनिया में तो
लाख गुने से भी ज्यादा हो जायेंगे। और मैंने आशा का जो एक पर्वत-सा
खड़ा कर रखा था, वह जैसे एकबारगी इतना छोटा हुआ कि राई बन गया, और
मुझे हॅसी आयी। जैसे कोई दानी पुरुष छटाँक भर अन्न हाथ में लेकर एक
लाख आदमियों को नेवता दे बैठे और यहाँ हमारे घर का एक-एक आदमी समझ
रहा है कि......
११ मैं भी हँसा-हाँ, बात तो यथार्थ में यही है, और हम दोनों
लिखा-पढ़ी के लिए लड़े मरते थे; मगर सच बताना, तुम्हारी नीयत खराब
हुई थी की नहीं?
विक्रम मुसकराकर बोला-अब क्या करोगे पूछकर। पर्दा ढंँका रहने दो।
اضغط ابدأ واكتب السطور بدقة.
لم يبدأ