كتاب · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
صفحة 240 من 251
المؤلف: प्रेमचंद
الوقت0:00
السرعة (WPM)0.0
الدقة100.0%
اضغط ابدأ واكتب السطور بدقة. · مفتاح الرجوع معطل — استمر حتى بعد الخطأ.
रामलीला इधर एक मुद्दत से रामलीला देखने नहीं गया। बन्दरो के
भद्दे चेहरे लगाये, आधी टांगों का पाजामा और काले रंग का कुरता पहने
आदमियों को दौड़ते, हू-हू करते देखकर अब हँसी आती है; मज़ा नही आता।
काशी की लीला जगद्विख्यात है। सुना है, लोग दूर-दूर से देखने आते
हैं। मैं भी बड़े शौक से गया; पर मुझे तो वहाँ की लीला और किसी वज्र
देहात की लीला में कोई अन्तर न दिखायी दिया। हाँ, रामनगर की लीला
में कुछ साज-समाज अच्छे हैं। राक्षसो और बन्दरों के चेहरे पीतल के
हैं। गदाएँ भी पीतल की; कदाचित् बनवासी भ्राताओं के मुकुट सच्चे काम
के हों; लेकिन साज-समाज के सिवा वहाँ भी वही हू-हू के सिवा और कुछ
नहीं। फिर भी लाखों आदमियों को भीड़ लगी रहती है।
اضغط ابدأ واكتب السطور بدقة.
لم يبدأ