Buch · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autor: प्रेमचंद
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वह स्वभाव से बड़े अध्ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद
दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर
चिड़ियों, कुत्तों, बिल्लियों की तस्वीरें बनाया करते थे। कभी-कभी
एक ही नाम या शब्द या वाक्य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को
बार-बार सुन्दर अक्षरों में नकल करते। कभी ऐसी शब्द-रचना करते,
जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्य। मसलन्ए क बार उनकी कापी पर
मैंने यह इबारत देखी-स्पेशल, अमीना, भाइयों-भाइयों, दर-असल,
भाई-भाई, राधेश्याम, श्रीयुत राधेश्याम, एक घंटे तक इसके बाद एक
आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने बहुत चेष्टा की कि इस पहेली का कोई
अर्थ निकालें, लेकिन असफल रहा। और उनसे पूछने का साहस न हुआ। वह नवी
जमात में थे, मैं पाँचवीं में।
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