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Autor: प्रेमचंद

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मोहसिन ने एड़ी-चोटी का जोर लगाकर कहा-अच्छा, पानी तो नहीं भर सकता।
हामिद ने चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा-भिश्ती को एक डाँट बतायेगा,
तो दौड़ा हुआ पानी लाकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा।
मोहसिन परास्त हो गया; पर महमूद ने कुमक पहुँचाई-अगर बच्चा पकड़
जायें तो अदालत में बँधे-बँधे फिरेंगे। तब तो वकील साहब के ही पैरों
पड़ेंगे। हामिद इस प्रबल तर्क का जवाब न दे सका। उसने पूछा-हमें
पकड़ने कौन जायेगा?
नूरे ने अकड़कर कहा-यह सिपाही बन्दूकवाला।
हामिद ने मुँह चिढ़ाकर कहा-यह बेचारे हम बहादुर रुस्तमे-हिन्द को
पकड़ेगे! अच्छा लाओ, अभी जरा कुश्ती हो जाय। इसकी सूरत देखकर दूर से
भागेंगे। पकड़ेंगे क्या बेचारे!
मोहसिन को एक नयी चोट सूझ गयी-तुम्हारे चिमटे का मुँह रोज आग में
जलेगा।
उसने समझा था कि हामिद लाजवाब हो जायगा; लेकिन यह बात न हुई। हामिद
ने तुरन्त जवाब दिया-आग में बहादुर ही कूदते हैं। जनाब, तुम्हारे यह
वकील, सिपाही और भिश्ती लैंडियों की तरह घर में घुस जायेंगे। आग में
कूदना वह काम है, जो यह रुस्तमे-हिन्द ही कर सकता है।

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