Buch · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Seite 7 von 251
Autor: प्रेमचंद
Zeit0:00
Tempo (WPM)0.0
Genauigkeit100.0%
Start drücken und den Text exakt schreiben. · Rucktaste deaktiviert — auch bei Fehlern weitertippen.
मोहसिन बोला-चलो, मनो आटा-पीस डालती हैं। जरा-सा-बैट पकड़ लेंगी,
तो, हाथ काँपने लगेंगे। सैकड़ों घड़े पानी रोज निकालती हैं। पाँच
घड़े तो तेरी भैंस पी जाती हैं। किसी मेम को एक घड़ा पानी-भरना पड़े
तो आँखों तले अँधेरा आ जाय।
महमूद-लेकिन दौड़ती तो नहीं, उछल-कूद तो नहीं सकतीं।
मोहसिन-हाँ,उछल-कूद नहीं सकतीं; लेकिन उस दिन मेरी गाय खुल गयी थी
और चौधरी के खेत में जा पड़ी थी, तो अम्मा इतना तेज दौड़ी कि मैं
उन्हें पा न सका, सच!
आगे चले। हलवाइयों की दुकानें शुरू हुई। आज खूब सजी हुई थीं। इतनी
मिठाइयाँ कौन खाता है? देखो न, एक-एक दूकान पर मनों होंगी। सुना है,
रात को जिन्नात आकर खरीद ले जाते हैं। अब्बा कहते थे कि आधी रात को
एक आदमी हर दुकान पर जाता है और जितना माल बचा होता है, वह तुलवा
लेता है और सचमुच के रुपये देता है, बिलकुल ऐसे ही रुपये।
हामिद को यकीन न आया-ऐसे रुपये जिन्नात को कहाँ से मिल जायेंगे?
Start drücken und den Text exakt schreiben.
Nicht gestartet