Buch · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autor: प्रेमचंद
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मुझे देखिए, मजे से खेलता भी रहा और दरजे में अव्वल भी हूँ। लेकिन
वह इतने दुःखी और उदास थे कि मुझे उनसे दिली हमदर्दी हुई और उनके
घाव पर नमक छिड़कने का विचार ही लज्जास्पद जान पड़ा। हाँ, अब मुझे
अपने ऊपर कुछ अभिमान हुआ और आत्माभिमान भी बढ़ा। भाई साहब का वह रोब
मुझ पर न रहा। आजादी से खेल कूद में शरीक होने लगा। दिल मजबूत था।
अगर उन्होंने फिर मेरी फजीहत की तो साफ कह दूंँगा-आपने अपना खून
जलाकर कौन-सा तीर मार लिया। मैं तो खेलते-कूदते दरजे में अव्वल आ
गया। जबान से यह हेकड़ी जताने का साहस न होने पर भी मेरे रंग-ढंग से
साफ जाहिर होता था कि भाई साहब का वह आतंक मुझ पर नहीं है। भाई साहब
ने इसे भाँप लिया-उनकी सहज बुद्धि बड़ी तीव्र थी और एक दिन जब मैं
भोर का सारा समय गुल्ली-डण्डे की भेट करके ठीक भोजन के समय लौटा तो
भाई साहब ने मानों तलवार खींच ली और मुझ पर टूट पड़े-देखता हूँ, इस
साल पास हो गये और दरजे में अव्वल आ गये, तो तुम्हें दिमाग हो गया
है; मगर भाई जान, घमंड तो बड़े-बड़ों का नहीं रहा, तुम्हारी क्या
हस्ती है? इतिहास में रावण का हाल तो पढ़ा ही होगा। उसके चरित्र से
तुमने कौन-सा उपदेश लिया?
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