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Author: प्रेमचंद

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आखिर यह तय हुआ कि पुरानी किताबें किसी सेकण्ड हैड किताबों की दुकान
पर बेच डाली जाये ओर उस रुपये से टिकट लिया जाय। किताबों से ज्यादा
बेजरूरत हमारे पास कोई चीज न थी। हम दोनों साथ ही मैट्रिक पास हुए
थे और यह देखकर कि जिन्होंने डिग्रियाँ ली, और आँखें फोड़ी, और घर
के रुपये बरबाद किये, वह भी जूतियाँ चटका रहे हैं, हमने वहीं हाल्ट
कर दिया। मैं स्कूल मास्टर हो गया और विक्रम मटरगश्त करने लगा।
हमारी पुरानी पुस्तकें अब दीमकों के सिवा हमारे किसी काम की न थीं।
हमसे जितना चाटते बना चाटा, उनका सत्त निकाल लिया, अब चूहे चाटें या
दीमक, हमें परवाह न थी। आज हम दोनों ने उन्हें कूड़खाने से निकाला
और झाड़-पोंछकर एक बड़ा-सा गट्ठर बाँधा। मै मास्टर था, किसी बुकसेलर
की दूकान पर किताब बेचते हुए झेंपता था। मुझे सभी पहचानते थे। इसलिए
यह खिदमत विक्रम के सुपुर्द हुई और वह आध घंटे में दस रुपये का एक
नोट लिये उछलता-कूदता आ पहुँचा। मैंने उसे इतना प्रसन्न कभी न देखा
था। किताबें चालीस रुपये से कम की न थीं, पर यह दस रुपये उस वक्त
हमें जैसे पड़े हुए मिले। अब टिकट में आधा साझा होगा। दस लाख की रकम
मिलेगी। पांँच लाख मेरे हिस्से में आयेंगे, पाँच विक्रम के। हम अपने
इसी में मगन थे।

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