Book · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Author: प्रेमचंद
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मुझे मिनिस्टर साहब से इतनी आशा अवश्य थी कि वह कम-से-कम इस विषय
में न्याय-परायणता से काम लेंगे; मगर उन्होंने न्याय की जगह नीति को
मान्य समझा और मुझे कई साल की भक्ति का यह फल मिला कि मैं पदच्युत
कर दिया गया। संसार का ऐसा कटु अनुभव मुझे अब तक न
८ हुआ था। ग्रह भी कुछ बुरे आ गये थे, उन्हीं दिनों पत्नी का
देहान्त हो गया। अंतिम दर्शन भी न कर सका। सन्ध्या समय नदी तट पर
सैर करने गया था। वह कुछ अस्वस्थ थीं। लौटा, तो उनकी लाश मिली।
कदाचित् हृदय की गति बन्द हो गयी थी। इस आघात ने कमर तोड़ दी। माता
के प्रसाद और आशीर्वाद से बड़े-बड़े महान् पुरुष कृतार्थ हो गये
हैं। मै जो कुछ हुआ, पत्नी के प्रसाद और आशीर्वाद से हुआ; वह मेरे
भाग्य की विधात्री थीं। कितना अलौकिक त्याग था, कितना विशाल धैर्य।
उनके माधुर्य में तीक्ष्णता का नाम भी न था। मुझे याद नहीं आता कि
मैने कभी उनकी भृकुटि संकुचित देखी हो। निराश होना तो जानती ही न
थीं। मैं कई बार सख्त बीमार पड़ा हूँ। वैद्य भी निराश हो गये हैं;
पर वह अपने धैर्य और शांति से अणुमात्र भी विचलित नहीं हुई। उन्हें
विश्वास था कि मैं अपने पति के जीवन-काल में मरूँगी और वही हुआ भी।
मै जीवन में अब तक उन्हीं के सहारे खड़ा था। जब वह अवलम्ब ही न रहा,
तो जीवन कहाँ रहता। खाने और सोने का नाम जीवन नहीं है। जीवन नाम है,
सदैव आगे बढ़ते रहने की लगन का। वह लगन गायब हो गयी। मैं संसार से
विरक्त हो गया। और एकांतवास में जीवन के दिन व्यतीत करने का निश्चय
करके एक छोटे से गांव में जा बसा। चारों तरफ ऊँचे-ऊँचे टीले थे, एक
ओर गंगा बहती थी। मैंने 'नदी के किनारे एक छोटा-सा घर बना लिया और
उसी में रहने लगा।
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