Book · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Author: प्रेमचंद
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मेरे बहुत आग्रह करने पर सूर्यप्रकाश ने अपना वृत्तान्त सुनाना शुरू
किया -- आपके चले आने के कई दिन बाद मेरा ममेरा भाई स्कूल में दाखिल
हुआ। उसकी उम्र आठ-नौ साल से ज्यादा न थी। प्रिंसिपल साहब उसे
होस्टल में न लेते थे और न मामा साहब उसके ठहरने का प्रबन्ध कर सकते
थे। उन्हें इस संकट में देखकर मैंने प्रिंसिपल साहब से कहा -- उसे
मेरे कमरे में ठहरा दीजिए। प्रिंसिपल साहब ने इसे नियम-विरुद्ध
बतलाया। इस पर मैंने बिगड़कर उसी दिन होस्टल छोड़ दिया, और एक
किराये का मकान लेकर मोहन के साथ रहने लगा। उसकी माँ कई साल पहले मर
चुकी थी। इतना दुबला-पतला, कमजोर और गरीब लड़का था कि पहले ही दिन
से मुझे उस पर दया आने लगी। कभी उसके सिर में दर्द होता, कभी ज्वर
हो पाता। आये दिन कोई-न-कोई बीमारी खड़ी रहती थी। इधर साँझ हुई और
उसे झपकियॉ आने लगी। बड़ी मुश्किल से भोजन करने उठता। दिन चढ़े तक
सोया करता और जब तक मै गोद में उठाकर बिठा न देता, उठने का नाम न
लेता। रात को बहुधा चौंककर मेरी चारपाई पर आ जाता और मेरे गले से
लिपटकर सोता। मुझे उस पर कभी क्रोध न आता। कह नहीं सकता, क्यों मुझे
उससे प्रेम हो गया। मैं जहाँ पहले नौ बजे सोकर उठता था, अब तड़के उठ
बैठता और उसके लिए दूध गर्म करता। फिर उसे उठा कर हाथ-मॅह धुलाता और
नाश्ता कराता। उसके स्वास्थ्य के विचार से नित्य वायु-सेवन को ले
जाता। मै जो कभी किताब लेकर न बैठता था, उसे घंटों पढ़ाया करता।
मुझे अपने दायित्व का इतना ज्ञान कैसे हो गया, इसका मुझे आश्चर्य
है। उसे कोई शिकायत हो जाती तो मेरे प्राणनखों में समा जाते। डाक्टर
के पास दौड़ता, दवाएँ लाता और मोहन की खुशामद करके दवा पिलाता। सदैव
यह चिन्ता लगी रहती थी, कि कोई बात उसको इच्छा के विरुद्ध न हो जाय।
इस बेचारे का यहाँ मेरे सिवा दूसरा कौन है। मेरे चंचल मित्रों में
से कोई उसे चिढ़ाता या छेड़ता तो मेरी त्योरियाँ बदल जाती थीं। कई
लड़के तो मुझे बूढ़ी दाई कहकर चिढ़ाते थे। पर मैं हँसकर टाल देता
था। मैं उसके सामने एक अनुचित शब्द भी मुँह से न निकालता। यह शंका
होती थी, कि कहीं मेरी देखा-देखी यह भी खराब न हो जाय। मैं उसके
सामने इस तरह रहना चाहता था, कि वह मुझे अपना आदर्श समझे और इसके
लिए यह मानी हुई बात थी कि मैं अपना चरित्र सुधारूँ। वह मेरा नौ बजे
सो कर उठना, बारह बजे तक मटरगश्ती करना, नई-नई शरारतों के मंसूबे
बाँधना और अध्यापकों की आँख बचाकर स्कूल से उड़ जाना, सब आप-ही-आप
जाता रहा। स्वास्थ्य और चरित्रपालन के सिद्धान्तों का
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