Book · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Author: प्रेमचंद
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अंत को यहाँ तक नौबत पहुँची कि खेती केवल मर्यादा रक्षा का
साधन-मात्र रह गयी, जीविका का भार मबूरी पर आ पड़ा।
सात वर्ष बीत गये, एक दिन शंकर मजूरी करके लौटा, तो राह में विप्रजी
ने टोककर कहा-शंकर, कल आके अपने बीज-बैंग का हिसाब कर ले। तेरे यहाँ
साढ़े पाँच मन गेहूँ कबसे बाकी पड़े हुए हैं और तूदे ने का नाम नहीं
लेता, हजम करने का मन है क्या?
शंकर ने चकित होकर कहा-मैने तुमसे कब गेहूँ लिये थे जो साढ़े पाँच
मन हो गये? तुम भूलते हो, मेरे यहाँ किसी का न छटॉक-भर अनाज है, न
एक पैसा उधार।
विप्र-इस नीयत का तो यह फल भोग रहे हो कि खाने को नहीं जुड़ता।
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