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Author: प्रेमचंद

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दोनों मित्रों को जीवन में पहली बार ऐसा सबका पड़ा कि सारा दिन बीत
गया और खाने को एक तिनका भी न मिला। समझ ही में न आता था, यह कैसा
स्वामी है। इससे तो गया फिर भी अच्छा था। वहाँ कई भैसे थीं; कई
बकरियों, कई घोड़े, कई गधे पर किसी के सामने चारा न था; ‌ सब जमीन
पर मुरदों की तरह पड़े थे। कई तो इतने कमजोर हो गये थे कि खड़े भी न
हो सकते थे। सारा दिन दोनों मित्र फाटक की ओर टकटकी लगाये ताकते
रहे; पर कोई चारा लेकर आता न दिखायी दिया। तब दोनों ने दीवार की
नमकीन मिट्टी चाटनी शुरू की; पर इससे क्या तृप्ति होती!
रात को भी जब कुछ भोजन न मिला, तो हीरा के दिल में विद्रोह की
ज्वाला दहक उठी। मोती से बोला-अब तो नहीं रहा जाता मोती!
मोती ने सिर लटकाये हुए जवाब दिया-मुझे तो मालूम होता है, प्राण
निकल रहे हैं।
'इतनी जल्द हिम्मत न हारो भाई! यहाँ से भागने का कोई उपाय निकालना
चाहिए।'
'आओ दीवार तोड़ डालें।'
'मुझसे तो अब कुछ न होगा।'
'बस, इसी बूते पर अकड़ते थे!'
'सारी अकल निकल गयी।'

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