Book · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 173 of 251
Author: प्रेमचंद
Time0:00
Speed (WPM)0.0
Accuracy100.0%
Press start and type the lines exactly as shown. · Backspace is disabled — keep going even after a mistake.
मैने कुछ उदास होकर कहा-लेकिन मुझे तो बराबर तुम्हारी याद आती थी।
तुम्हारा वह डण्डा, जो तुमने तानकर जमाया था, याद है न?
गया ने पछताते हुए कहा-वह लड़कपन था सरकार, उसकी याद न दिलायो।
'वाह! वह मेरे बाल-जीवन की सबसे रसीली याद है। तुम्हारे उस डण्डे
में जो रस था, वह तो अब न आदर-सम्मान में पाता हूँ, न धन में। कुछ
ऐसी मिठास थी उसमें कि आज तक उससे मन मीठा होता रहता है।
इतनी देर में हम बस्ती से कोई तीन मील निकल आये हैं। चारों तरफ
सन्नाटा है। पश्चिम की ओर कोसों तक भीमताल फैला हुआ है, जहाँ आकर हम
किसी समय कमल पुष्प तोड़ ले जाते थे और उसके झुमक बनाकर कानों में
डाल लेते थे। जेठ की सन्ध्या केसर में डूबी चली आ रही है। मैं लपककर
एक पेड़ पर चढ़ गया और एक टहनी काट लाया। चट-पट गुल्ली-डण्डा बन
गया।
Press start and type the lines exactly as shown.
Not started