Book · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 220 of 251
Author: प्रेमचंद
Time0:00
Speed (WPM)0.0
Accuracy100.0%
Press start and type the lines exactly as shown. · Backspace is disabled — keep going even after a mistake.
व्रिप्र -- लेकिन वह तो ६०) ही है।
शंकर -- हाँ , महाराज, इतने अभी ले लीजिए, बाकी मैं दो-तीन महिने
में दे दूँगा, मुझे उरिन कर दीजिए।
विप्र -- उरिन तो जभी होगे जब मेरी कौडी़-कौडी़ चुका दोगे। जाकर
मेरे १५) और लाओ।
शंकर -- महाराज , इतनी दया करो, अब साँझ की रोटियों का भी ठिकाना
नहीं है, गाँव में हूँ तो कभी दे ही दूँगा।
विप्र -- मैं यह रोग नहीं पालता, न बहुत बातें करनी जानता हूँ। अगर
मेरे पूरे रूपये न मिलेगे तो आज से ३।।) सैकडे का ब्याज लगेगा। अपने
रूपये चाहे अपने घर में रखो, चाहे मेरे यहाँ छोड जाओ।
शंकर -- अच्छा, जितना लाया हूँ उतना रख लिजिए। मैं जाता हूँ, कही से
१५) और लाने की फ़िक्र करता हूँ।
शंकर ने सारा गाँव छान मारा ,मगर किसी ने रूपये न थे, बलि्क इसलिए
कि पंडितजी के शिकार को छोड़ने की किसी की हिम्मत न थी।
( ३ )
क्रिया के पश्चात प्रतिक्रिया नैसर्गिक नियम है। शंकर साल भर तक
तपस्या करने पर भी जब ऋण से मुक्त होने में सफल न हो सका तो उसका
संयम निराशा के रूप में परिणत हो गया। उसने समझ लिया कि जब इतना
कष्ट सहने पर भी साल में ६०) से अधिक न जमा
Press start and type the lines exactly as shown.
Not started