Book · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Author: प्रेमचंद
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अगर कुछ लोगों को उन्हें परास्त मानने में ही सन्तोष हो, तो हो;
लेकिन वास्तव में उन्होंने एक युगान्तरकारी विजय प्राप्त की थी। वे
जानते थे, हमारा संघर्ष अपने ही भाइयों से है, जिनके हित
परिस्थितियों के कारण हमारे हितों से भिन्न हैं। हमें उनसे वैर नहीं
करना है। फिर, वह यह भी नहीं चाहते थे कि शहर में लूट और दंगे का
बाजार गर्म हो जाय और हमारे धर्मयुद्ध का अन्त लूटी हुई दूकानें और
टूटे हुए सिर हो। उनकी विजय का सबसे उज्ज्वल चिन्ह यह था कि
उन्होंने जनता की सहानुभूति प्राप्त कर ली थी। वही लोग, जो पहले उन
पर हँसते थे, उनका धैर्य और साहस देखकर उनको सहायता के लिए निकल
पड़े थे। मनोवृत्ति का यह परिवर्तन ही हमारी असली विजय है। हमें
किसी से लड़ाई करने की जरूरत नहीं, हमारा उद्देश्य केवल जनता की
सहानुभूति प्राप्त करना है, उसकी मनोवृत्तियों को बदल देना है। जिस
दिन हम इस लक्ष्य पर पहुँच जायेंगे, उसी दिन स्वराज्य-सूर्य उदय
होगा।
(३)
तीन दिन गुजर गये थे। बीरबलसिंह अपने कमरे में बैठे चाय पी रहे थे
और उनकी पत्नी मिट्ठन बाई शिशु को गोद में लिये सामने खड़ी थीं।
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