Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autor: प्रेमचंद
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हमने कई बैंकों के सूद का दर देखा, स्थायी कोष का भी, सेविंग बैंक
का भी। बेशक दर बहुत कम था। दो-ढाई रुपये सैकड़े ब्याज पर जमा करना
व्यर्थ है। क्यों न लेन-देन का कारोबार शुरू किया जाय। विक्रम भी
यात्रा पर न जायगा। दोनों के साझे में कोठी चलेगी, जब कुछ धन जमा हो
जायग, तब वह यात्रा करेगा। लेन-देन में सूद भी अच्छा मिलेगा और अपना
रोब-दाब भी रहेगा। हाँ, जब तक अच्छी जमानत न हो, किसी को रुपया न
देना चाहिए, चाहे आसामी कितना ही मातबर क्यों न हो। और जमानत पर
रुपये दे ही क्यों। जायदाद रेहन लिखाकर रुपये देंगे। फिर तो कोई
खटका न रहेगा।
यह मंजिल भी तय हुई। अब यह प्रश्न उठा कि टिकट पर किसका नाम रहे।
विक्रम ने अपना नाम रखने के लिए बड़ा आग्रह किया; अगर उसका नाम न
रहा, तो वह टिकट ही न लेगा। मैंने कोई उपाय न देखकर मंजूर कर लिया,
और बिना किसी लिखा-पढ़ी के, जिससे आगे चलकर मुझे बड़ी परेशानी हुई।
( २ )
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