Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autor: प्रेमचंद
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का सम्बन्ध है। मेरा विचार है कि यूरोप में अनिवार्य शिक्षा की
जरूरत है, भारत में नहीं। भौतिकता पश्चिमी सभ्यता का मूल तत्व है।
वहाँ किसी काम की प्रेरणा, आर्थिक लाभ के आधार पर होती है। जिन्दगी
की जरूरतें ज्यादा हैं। इसलिए जीवन-संग्राम भी अधिक भीषण है।
माता-पिता भोग के दास होकर बच्चों को जल्द-जल्द कुछ कमाने पर मजबूर
करते हैं। इसकी जगह कि वह मद का त्याग करके एक शिलिंग रोज की बचत कर
लें, वे अपने कमसिन बच्चे को एक शिलिंग की मजदूरी करने के लिए
दबायेंगे। भारतीय जीवन में सात्विक सरलता है। हम उस वक्त तक अपने
बच्चों से मजदूरी नहीं कराते, जब तक कि परिस्थिति हमें विवश न कर
दे। दरिद्र-से-दरिद्र हिन्दुस्तानी मजदूर भी शिक्षा के उपकारों का
कायल है। उसके मन में यह अभिलाषा होती है कि मेरा बच्चा चार अक्षर
पढ़ जाय। इसलिए नहीं कि उसे कोई अधिकार मिलेगा; बल्कि केवल इसलिए कि
विद्या मानवी शील का एक श्रृंगार है। अगर यह जानकर भी वह अपने बच्चे
को मदरसे नहीं भेजता, तो समझ लेना चाहिए कि वह मजबूर है। ऐसी दशा
में उस पर कानून का प्रहार करना मेरी दृष्टि में न्याय-संगत नहीं
है। इसके सिवाय मेरे विचार में अभी हमारे देश में योग्य शिक्षकों का
अभाव है। अर्द्ध शिक्षित और अल्प वेतन पानेवाले अध्यापकों से आप यह
आशा नहीं रख सकते हैं कि वह कोई ऊँचा आदर्श अपने सामने रख सकें।
अधिक-से-अधिक इतना ही होगा कि चार-पाँच वर्ष में बालक को
अक्षर-ज्ञान हो जायगा। मैं इसे पर्वत खोदकर चुहिया निकालने के तुल्य
समझता हूँ। वयस प्राप्त हो जाने पर यह मसला एक महीने में आसानी से
तय किया जा सकता है। मैं अनुभव से कह सकता हूँ कि युवावस्था में हम
जितना ज्ञान एक 'महीने में प्राप्त कर सकते हैं, उतना बाल्यावस्था
में तीन साल में भी नहीं कर सकते, फिर खामख्वाह बच्चों को मदरसे में
कैद करने से क्या
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