Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Pagina 241 de 251
Autor: प्रेमचंद
Tiempo0:00
Velocidad (WPM)0.0
Precisión100.0%
Pulsa iniciar y escribe las líneas exactamente. · Retroceso desactivado — continua incluso tras un error.
लेकिन एक ज़माना वह था, जब मुझे भी रामलीला में आनन्द आता था। आनन्द
तो बहुत हल्का-सा शब्द है। वह आनन्द उन्माद से कम न था। संयोगवश उन
दिनों मेरे घर से बहुत थोड़ी दूर पर रामलीला का मैदान था और जिस घर
में लीला-पात्रों का रूप-रंग भरा जाता था, वह मेरे घर से बिलकुल
मिला हुआ था। दो बजे दिन से पात्रों की सजावट होने लगती थी। मैं
दोपहर ही से वहाँ जा बैठता और जिस उत्साह से दौड़-दौड़कर मोटे-मोटे
काम करता, उस उत्साह से तो आज अपनी पेन्शन भी लेने नहीं जाता। एक
कोठरी में राजकुमारों का शृंगार होता था। उनकी देह में रामरज पीसकर
पोती जाती मुँह पर पाउडर लगाया जाता और पाउडर के ऊपर लाल, हरे, नीले
रंग की बुँदकियाँ लगायी जाती थीं। सारा माथा, भौहें, गाल, ठोढ़ी
बुँदकियों से रच उठती थीं। एक ही आदमी इस काम में कुशल था। वही
बारी-बारी से तीनों पात्रों का शृङ्गार करता था। रंग को प्यालियों
में पानी लाना, रामरज पीसना, पंखा झलना मेरा काम था। जब इन
तैयारियों के बाद विमान निकलता, तो उस पर रामचन्द्रजी के पीछे बैठकर
मुझे जो उल्लास, जो गर्व, जो रोमांच होता था, वह अब लाट साहब के
दरबार में कुरसी पर बैठकर भी नहीं होता। एक बार जब होम मेम्बर साहब
ने व्यवस्थापक सभा में मेरे एक प्रस्ताव का अनुमोदन किया था, उस
वक्त मुझे कुछ उसी तरह का उल्लास, गर्व और रोमांच हुआ था। हाँ, एक
बार जब मेरा ज्येष्ठ पुत्र नायब तहसीलदारी में नामजद हुआ, तब भी कुछ
ऐसी ही तरंगें मन में उठी थीं; पर इनमें और बाल विह्वलता मे बड़ा
अन्तर है। तब तो ऐसा मालूम होता था कि मैं स्वर्ग में बैठा हूँ।
Pulsa iniciar y escribe las líneas exactamente.
Sin iniciar