Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Auteur: प्रेमचंद
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लिपि में इतना भेद न था जो कोई सन्देह उत्पन्न कर सकता। मैंने
प्रिंसिपल से कहा, तो वह भी चकरा गये; मगर उन्हें भी जान-बूझकर
मक्खी निगलनी पड़ी। मै कदाचित् स्वभाव से ही निराशावादी हूँ। अन्य
अध्यापकों को मै सूर्यप्रकाश के विषय में जरा भी चिन्तित न पाता था।
मानो ऐसे लड़को का स्कूल में आना कोई नयी बात नहीं; मगर मेरे लिए वह
एक विकट रहस्य था। अगर यही ढंग रहे, तो एक दिन वह या तो जेल में
होगा, या पागलखाने मे।
( २ )
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