Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Auteur: प्रेमचंद
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हूँ। एक दिन मैं कई मित्रों के साथ थियेटर देखने चला गया, ताकीद कर
गया था कि तुम खाना खाकर सो रहना। तीन बजे रात को लौटा, तो देखा कि
वह बैठा हुआ है। मैंने पूछा -- तुम सोये नहीं? बोला -- नींद नहीं
आयी। उस दिन से मैंने थियेटर जाने का नाम न लिया। बच्चों में प्यार
की जो एक भूख होती है -- दूध, मिठाई और खिलौनों से भी ज्यादा मादक -
जो माँ की गोद के सामने संसार की निधि की भी परवाह नहीं करते, मोहन
की वह भूख कभी सतुष्ट न होती थी, पहाड़ों से टकरानेवाली सारस की
आवाज की तरह वह सदैव उसकी नसों में गूँजा करती थी। जैसे भूमि पर
फैली हुई लता कोई सहाग पाते ही उससे चिपट जाती है, वही हाल मोहन का
था। वह मुझसे ऐसा चिपट गया था कि पृथक् किया जाता तो उसकी कोमल बेलि
के टुकड़े-टुकड़े हो जाते। वह मेरे साथ तीन साल रहा और तब मेरे जीवन
में प्रकाश की एक रेखा डालकर अन्धकार में विलीन हो गया। उस जीर्ण
काया में कैसे-कैसे अरमान भरे हुए थे। कदाचित् ईश्वर ने मेरे जीवन
में एक अवलम्ब की सृष्टि करने के लिए उसे भेजा था। उद्देश्य पूरा हो
गया तो वह क्यों रहता?
( ४ )
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