Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Auteur: प्रेमचंद
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छुट्टी इस तरह तमाम हुई और हम फिर प्रयाग चले। गाँव के बहुतसे लोग
हम लोगों को पहुंँचाने आये। ठाकुर तो हमारे साथ स्टेशन तक आया।
मैंने भी अपना पार्ट खूब सफाई से खेला और अपनी कुबेरोचित विनय और
देवत्व को मुहर हरेक हृदय पर लगा दी। जी तो चाहता था, हरेक नौकर को
अच्छा इनाम दूंँ; लेकिन वह सामर्थ्य कहाँ थी? वापसी टिकट था ही,
केवल गाड़ी में बैठना था; पर गाड़ी आयी तो ठसाठस भरी हुई।
दुर्गापूजा की छुट्टियाँ भोगकर सभी लोग लौट रहे थे। सेकण्ड क्लास
में तिल रखने की जगह नहीं। इण्टर क्लास की हालत उससे भी बदतर। यह
आखिरी गाड़ी थी। किसी तरह रुक न सकते थे। बड़ी मुश्किल से तीसरे
दरजे में जगह मिली। हमारे ऐश्वर्य ने वहाँ अपना रंग जमा लिया; मगर
मुझे उसमें बैठना बुरा लग रहा था। आये थे आराम से लेटे-लेटे, जा रहे
थे सिकुड़े हुए। पहलू बदलने को भी जगह न थी।
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