Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 236 sur 251
Auteur: प्रेमचंद
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अन्त में उन्होंने सिह को उसकी माँद में ही पछाड़ने का निश्चय किया।
सन्ध्या का समय था। चौधरी के द्वार पर एक बड़ी सभा हो रही थी। आसपास
के गाँव के किसान भी आ गये थे। हजारो आदमियों की भीड़ थी। चौधरी
उन्हें स्वराज्य विषयक उपदेश दे रहे थे। बारम्बार भारतमाता की जयकार
को ध्वनि उठती थी। एक ओर स्त्रियों का जमाव था। चौधरी ने अपना उपदेश
समाप्त किया और अपनी गद्दी पर बैठे। स्वयंसेवकों ने स्वराज्यफंड के
लिए चन्दा जमा करना शुरू किया कि इतने में भगतजी न जाने किधर से
लपके हुए आये और श्रोताओं के सामने खड़े होकर उच्च स्वर से बोले:-
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