Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 39 sur 251
Auteur: प्रेमचंद
Temps0:00
Vitesse (WPM)0.0
Précision100.0%
Clique sur démarrer puis tape exactement les lignes. · Retour arriere desactive — continuez meme apres une erreur.
मिट्ठन-फिर तो तुम्हारी चाँदी है, तैयार हो जाओ। आज फिर वैसे ही
शिकार मिलेंगे। खूब बढकर हाथ दिखाना! डी० एस० पी० भी जरूर जायेंगे।
अब की तुम इन्सपेक्टर हो जानोगे। सच!
बीरबलसिंह ने माथा सिकोड़कर कहा-कभी-कभी तुम बे-सिर-पैर की बातें
करने लगती हो। मान लो, मैं जाकर चुपचाप खड़ा रहूँ, तो क्या नतीजा
होगा। मैं नालायक समझा जाऊँगा और मेरी जगह कोई दूसरा आदमी भेज दिया
जायगा। कहीं शुबहा हो गया कि मुझे स्वराज्य वादियों से सहानुभूति
है, तो कहीं का न रहूँगा। अगर बर्खास्त न हुआ तो लैन की हाजिरी तो
हो ही जायगी। आदमी जिस दुनिया में रहता है, उसी का चलन देखकर काम
करता है। मैं बुद्धिमान् न सही; पर इतना जानता हूँ कि ये लोग देश और
जाति का उद्धार करने के लिए ही कोशिश कर रहे हैं। यह भी जानता हूँ
कि सरकार इस खयाल को कुचल डालना चाहती है। ऐसा गधा नहीं हूँ कि
गुलामी की जिन्दगी पर गर्व करूँ; लेकिन परिस्थिति से मजबूर हूँ।
Clique sur démarrer puis tape exactement les lignes.
Non démarré