Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Auteur: प्रेमचंद
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वह बड़ी देर तक पार्क में घास पर बैठी मोचतो रही; पर अपने कर्तव्य
का कुछ निश्चय न कर सकी। मैके जा सकती थी; किन्तु वहाँ से महीने
दो-महीने में फिर इसी घर में आना पड़ेगा। नहीं, मैं किसी की आश्रित
न बनूँगी। क्या मैं अपने गुजर-बसर को नहीं कमा सकती? उसने स्वयं
भॉति-भाँति की कठिनाइयों की कल्पना की, पर आज उसको आत्मा में न जाने
इतना बल कहाँ से आ गया था। इन कल्पनामों का ध्यान में लाना ही उसे
अपनी कमजोरी मालूम हुई।
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