Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Auteur: प्रेमचंद
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मुझे न्याय का बल था। वह अन्याय पर डटा हुया था। मैं हाय छुड़ाकर
भागना चाहता था। वह मुझे जाने न देता था। मैने गाली दी, उसने उससे
कड़ी गाली दी, और गाली ही नहीं, दो-एक चाँटा जमा दिया। मैंने उसे
दाँत काट लिया। उसने मेरी पीठ पर डण्डा जमा दिया। मैं रोने लगा। गया
मेरे इस अस्त्र का मुकाबला न कर सका। भागा। मैंने तुरन्त आँसू पोंछ
डाले, डंडे की चोट भूल गया और हँसता हुआ घर पर जा पहुँचा। मै
थानेदार का लड़का, एक नीच जात के लौंडे के हाथों पिट गया, यह मुझे
उस समय भी अपमानजनक मालूम हुआ; लेकिन घर में किसी से शिकायत न की।
( २ )
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