Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 207 sur 251
Auteur: प्रेमचंद
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प्रभात ही से तैयारी होने लगी। बैदों और अन्य निकटवर्ती गाँवों में
सुपारी फिरी। कथा के उपरान्त भोज का भी नेवता था। जो सुनता, आश्चर्य
करता-'यह आज रेत में दूब कैसे जमी!'
सन्ध्या समय जब सब लोग जमा हो गये, पंडितजी अपने सिहासन पर विराजमान
हुए, तो महादेव खड़ा होकर उच्च स्वर में बोला-
'भाइयो, मेरी सारी उम्र छल-कपट में कट गयी। मैंने न जाने कितने
आदमियों को दगा दी, कितना खरे को खोटा किया, पर अब भगवान्ने मुझ पर
दया की है, वह मेरे मुँह की कालिख मिटाना चाहते हैं। मैं आप सभी
भाइयों से ललकारकर कहता हूँ कि जिसका मेरे जिम्मे जो कुछ निकलता हो,
जिसको जमा मैने मार ली हो, जिसके चोखे माल को खोटा कर दिया हो,वह
आकर अपनी एक-एक कौड़ी चुका ले। अगर कोई यहाँ न पा सका हो, तो आप लोग
उससे जाकर कह दीजिए, कल से एक महीने तक जब जी चाहे, आये, और अपना
हिसाब चुकता कर ले। गवाही साखी का काम नहीं।
सब लोग सन्नाटे में आ गये। कोई मार्मिक भाव से सिर हिलाकर बोला-'हम
कहते न थे!' किसी ने अविश्वास से कहा-'क्या खाकर भरेगा, हजारों का
टोटल हो जायगा!'
एक ठाकुर ने ठठोली की-'और जो लोग सुरधाम चले गये?'
महादेव ने उत्तर दिया-'उनके घरवाले तो होंगे?'
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