Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Auteur: प्रेमचंद
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महमूद-दुआ को लिये फिरते हो। उलटे मार न पड़े। अम्माँ जरूर कहेंगी
कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने तुम्हें मिले?
हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की मांँ इतनी
खुश न होगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी। तीन पैसों ही में तो
उसे सब कुछ करना था, और उन पैसों के इस उपयोग पर पछतावे की बिलकुल
जरूरत न थी। फिर अब तो चिमटा रुस्तमे-हिन्द है और सभी खिलौनों का
बादशाह।
रास्ते में महमूद को भूख लगी। उसके बाप ने केले खाने को दिये। महमूद
ने केवल हामिद को साझी बनाया। उसके अन्य मित्र मुँह ताकते रह गये।
यह उस चिमटे का प्रसाद था।
(३)
ग्यारह बजे सारे गाँव में हलचल मच गयी। मेलेवाले आ गये। मोहसिन की
छोटी बहन ने दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जो
उछली, तो मियाँ भिश्ती नीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे। इस पर भाई-बहन
में मार-पीट हुई। दोनों खूब रोये। उनकी अम्माँ यह शोर सुनकर बिगड़ी
और दोनो को ऊपर से दो-दो चाँटे और लगाये।
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