Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Auteur: प्रेमचंद
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जुलूस के बूढ़े नेता इब्राहीमअली ने आगे बढ़कर कहा-मैं आपको
इत्मीनान दिलाता हूँ, किसी किस्म का दंगा-फसाद न होगा। हम दूकानें
लूटने या मोटरें तोड़ने नहीं निकले हैं। हमारा मकसद इससे कहीं ऊँचा
है।
बीरबल--मुझे यह हुक्म है कि जुलूस यहाँ से आगे न जाने पाये।
इब्राहिम--आप अपने अफसरों से जरा पूछ न लें।
बीरबल--मैं इसकी कोई जरूरत नहीं समझता।
इब्राहिम--तो हम लोग यहीं बैठते हैं। जब आप लोग चले जायेंगे तो हम
निकल जायेंगे।
बीरबल--यहाँ खड़े होने का भी हुक्म नहीं है। तुमको वापस जाना
पड़ेगा।
इब्राहिम ने गम्भीर भाव से कहा-वापस तो हम न जायेगे। आपको या किसी
को भी हमें रोकने का कोई हक नहीं है। आप अपने सवारों, संगीनों और
बन्दूकों के जोर से हमें रोकना चाहते हैं, रोक लीजिए; मगर आप हमें
लौटा नहीं सकते। न जाने वह दिन कब आयेगा, जब हम, हमारे भाई-बन्द ऐसे
हुक्मों की तामील करने से साफ इन्कार कर देंगे, जिनकी मंशा महज कौम
को गुलामी की जंजीरों में जकड़े रखना है।
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