Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 45 sur 251
Auteur: प्रेमचंद
Temps0:00
Vitesse (WPM)0.0
Précision100.0%
Clique sur démarrer puis tape exactement les lignes. · Retour arriere desactive — continuez meme apres une erreur.
ग्यारह बजते-बजते जुलूम नदी के किनारे जा पहुंँचा, जनाजा उतारा गया
और लोग शव को गगास्नान कराने के लिए चले। उसके शीतल, शान्त, पीले
मस्तक पर लाठी की चोट साफ नजर आ रही थी। रक्त जमकर काला हो गया था।
सिर के बड़े-बड़े बाल खून जम जाने से किसी चित्रकार की तूलिका की
भाँति चिमट गये थे। कई हजार आदमी इस शहीद के अन्तिम दर्शनों के लिए
मण्डल बाँधकर खड़े हो गये। बीरबलसिंह पीछे घोड़े पर सवार खड़े थे।
लाठी की चोट उन्हें भी नजर आयी। उनकी आत्मा ने जोर से धिक्कारा। वह
शव की ओर न ताक सके। मुँह फेर लिया। जिस मनुष्य के दर्शनों के लिए,
जिसके चरणों को रज मस्तक पर लगाने के लिए लाखों आदमो विकल हो रहे
हैं, उसका मैने इतना अपमान किया! उनको आत्मा इस समय स्वीकार कर रही
थी कि उस निर्दय प्रहार में कर्तव्य के भाव का लेश भी न था-केवल
स्वार्थ था, कारगुजारी दिखाने की हवस और अफसरों को खुश करने की
लिप्सा। हजारों आँखें क्रोध से भरी हुई उनकी ओर देख रही थीं; पर वह
सामने ताकने का साहस न कर सकते थे।
एक कांस्टेबल ने आकर प्रशंसा की-हुजूर का हाथ गहरा पड़ा था। अभी तक
खोपड़ी खुली हुई है। सबकी आँखें खुल गयीं।
Clique sur démarrer puis tape exactement les lignes.
Non démarré