Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Auteur: प्रेमचंद
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आगे चले। यह पुलिस लाइन है। यहीं सब कानिसटिबिल कवायद करते हैं।
रैटन! फाय फो! रात को बेचारे घूम-घूमकर पहरा देते हैं नहीं चोरियाँ
हो जायँ। मोहसिन ने प्रतिवाद किया-यह कानिसटिबिल पहरा देते हैं! तभी
तुम बहुत जानते हो। अजी हजरत, यही चोरी कराते हैं। शहर के जितने चोर
डाकू हैं, सब इनसे मिलते हैं, रात को ये लोग चोरों से तो कहते हैं,
चोरी करो और आप दूसरे मुहल्ले में जाकर जागते रहो! जागते रहो!
पुकारते हैं। जभी इन लोगों के पास इतने रुपये आते हैं। मेरे मामूँ
एक थाने में कानिसटिबिल हैं। बीस रुपया महीना पाते हैं, लेकिन पचास
रुपये घर भेजते हैं। अल्ला कसम। मैंने एक बार पूछा था कि मामूँ, आप
इतने रुपये कहाँ से पाते हैं? हँसकर कहने लगे-बेटा, अल्लाह देता है।
फिर आप ही बोले-हम लोग चाहें तो एक दिन में लाखों मार लायें। हम तो
इतना ही लेते हैं, जिसमें अपनी बदनामी न हो और नौकरी न चली जाय।
हामिद ने पूछा-यह लोग चोरी करवाते हैं तो कोई इन्हें पकड़ता नहीं?
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