पुस्तक · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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लेखक: प्रेमचंद
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किन्तु मुझे उसके इन आश्वासनों पर मिलकुल विश्वास न आया। मन में एक
संशय पैंठ गया। मैने कहा-यह तो मैं जानता हूँ, कि तुम्हारी नीयत कभी
विचलित नहीं हो सकती; लेकिन लिखा-पढ़ी कर लेने में क्या हरज है?
'फिजूल है।'
'फजून ही सही।
'तो पक्के कागज पर लिखना पड़ेगा। दस लाख की कोर्ट-फीस ही साढ़े सात
हजार हो जायेगी। किस भ्रम में हैं आप!'
मैने सोचा, बला से, सादी लिखा-पढ़ी के बल पर कोई कानूनी कार्रवाई न
कर सकूँगा। पर इन्हें लज्जित करने का, इन्हें जलील करने का, इन्हें
सबके सामने बेईमान सिद्ध करने का अवसर तो मेरे हाथ आयेगा, और दुनिया
में बदनामी का भय न हो, तो आदमी न जाने क्या करे। अपमान का भय कानून
के भय से किसी तरह कम क्रियाशील नहीं होता। बोला-मुझे सादे कागज पर
ही विश्वास आ जायगा।
'विक्रम ने लापरवाही से कहा-जिस कागज का कोई कानूनी महत्व नहीं, उसे
लिखकर क्यों समय नष्ट करें?
मुझे निश्चय हो गया, विक्रम की नीयत में अभी से फितूर आ गया। नहीं
तो सादा कागज लिखने में क्या बाधा हो सकती है। बिगड़कर कहा-तुम्हारी
नीयत अभी से खराब हो गयी।
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