पुस्तक · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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लेखक: प्रेमचंद
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'एक पैसा भी नहीं। कहते हैं, कुछ बचत नहीं हुई। मैंने सोचा था, कुछ
रुपये मिल जायेंगे, तो पढ़ने की किताबें ले लूँगा। सो कुछ न मिला।
राह-खर्च भी नहीं दिया। कहते हैं, कौन दूर है, पैदल चले जाओ।'
मुझे ऐसा क्रोध आया कि चलकर चौधरी को खून आड़े हाथों लूँ। वेश्याओं
के लिए रुपये,सवारियाँ सब कुछ; पर बेचारे रामचन्द्र और उनके साथियों
के लिए कुछ भी नहीं। जिन लोगों ने रात को आबदीजान पर दस-दस, बीस-बीस
रुपये न्योछायर किये थे, उनके पास क्या इनके लिए दो-दो, चार-चार आने
पैसे भी नहीं हैं? पिताजी ने भी तो आबदीजान को एक अशर्फी दी। देखूँ,
इनके नाम पर क्या देते हैं। मैं दौड़ा हुआ पिताजी के पास गया। वह
कहीं तफ़तीश पर जाने को तैयार खड़े थे। मुझे देखकर बोले-कहाँ घूम
रहे हो? पढ़ने के वक्त तुम्हें घूमने की सूझती है?
मैंने कहा-गया था चौपाल। रामचन्द्र बिदा हो रहे हैं। उन्हें चौधरी
साहब ने कुछ नहीं दिया।
'तो तुम्हें इसकी क्या फिक्र पड़ी है?'
'वह जायँगे कैसे? पास राह-खर्च भी तो नहीं है!'
'क्या कुछ खर्च भी नहीं दिया? यह चौधरी साहब की बेइंसाफी है।' 'आप
अगर २) दे दें, तो मैं उन्हें दे आऊँ। इतने में शायद वह घर पहुँच
जायँ।'
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