पुस्तक · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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लेखक: प्रेमचंद
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शंभू एक मिनट तक मौन खड़ा रहा। एकाएक उसने भी दूकान बढ़ायी और
बोला-एक दिन तो मरना ही है, जो कुछ होना है, हो। आखिर वे लोग सभी के
लिए तो जान दे रहे हैं। देखते-देखते अधिकांश दूकाने बन्द हो गयीं।
वह लोग, जो दस मिनट पहले तमाशा देख रहे थे, इधर-उधर से दौड़ पड़े और
हजारों आदमियों का एक विराट दल घटनास्थल की ओर चला। यह उन्मत्त,
हिंसामद से भरे हुए मनुष्यों का समूह था, जिसे सिद्धान्त और आदर्श
की परवाह न थी। जो मरने के लिए ही नहीं, मारने के लिए भी तैयार थे।
कितनो ही के हाथों में लाठियाँ थीं, कितने ही जेबों में पत्थर भरे
हुए थे। न कोई किसी से कुछ बोलता था, न पूछता था। बस सब-के-सब मन
में एक दृढ़ संकल्प किये लपके चले जा रहे थे, मानो कोई घटा उमड़ी
चली आती हो।
इस दल को दूर से देखते ही सवारों में कुछ हलचल पड़ी। बीरबल-सिंह के
चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। डी॰ एस॰ पी॰ ने अपनी मोटर आगे बढ़ायी।
शान्ति और अहिंसा के व्रतधारियों पर डण्डे बरसाना और बात थी, एक
उन्मत्त दल से मुकाबला करना दूसरी बात। सवार और सिपाही पीछे खिसक
गये।
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