पुस्तक · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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लेखक: प्रेमचंद
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शाम तक यही हाल रहा। तोता कभी इस डाल पर जाता, कभी उस डाल पर। कभी
पिंजड़े पर आ बैठता, कभी पिंजड़े के द्वार पर बैठ अपने दान-पानी की
प्यालियों को देखता, और फिर उड़ जाता। बुड्ढा अगर मूर्तिमान मोह था,
तो तोता मूर्तिमती माया। यहाँ तक कि शाम हो गयी। माया और मोह का यह
सग्राम अंधकार में विलीन हो गया।
( ३ )
रात हो गयी। चारों ओर निविड़ अंधकार छा गया। तोता न जाने पत्तों में
कहाँ छिपा बैठा था। महादेव जानता था कि रात को तोता कहीं उड़कर नहीं
जा सकता, और न पिंजड़े ही में आ सकता है, फिर भी वह उस जगह से हिलने
का नाम न लेता था। आज उसने दिन-भर कुछ नहीं खाया, रात के भोजन का
समय भी निकल गया, पानी की एक बंद भी उसके कंठ में न गयी; लेकिन उसे
न भूख थी, न प्यास। तोते के बिना उसे अपना जीवन निस्सार, शुष्क और
सूना जान पड़ता था। वह दिन-रात काम करता था, इसलिए कि यह उसकी
अतः-प्रेरणा थी, जीवन के और काम इसलिए करता था कि आदत थी। इन कामों
में उसे अपनी सजीवता का लेशमात्र भी ज्ञान न होता था। तोता ही वह
वस्तु था, जो उसे चेतना को याद दिलाता था। उसका हाथ से जाना जीव का
देह त्याग करना था।
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