Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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सहसा ईदगाह नजर आया। ऊपर इमली के घने वृक्षो की छाया है। नीचे पक्का
फर्श है, जिस पर जाजिम बिछा हुआ है। और रोजेदारों की पक्तियाँ एक के
पीछे एक न जाने कहाँ तक चली गयी हैं, पक्की जगत के नीचे तक, जहाँ
जाजिम भी नहीं है। नये आनेवाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते
हैं। आगे जगह नहीं है। यहाँ कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की
निगाह में सब बराबर हैं। इन ग्रामीणों ने भी वजू किया और पिछली
पंक्ति में खड़े हो गये। कितना सुन्दर संचालन है, कितनी सुन्दर
व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सब-के-सब
एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हैं और एक साथ घुटनों के बल
बैठ जाते हैं। कई बार यही क्रिया होती है, जैसे बिजली की लाखों
बत्तियां एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जायँ, और यही क्रम चलता
रहे। कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाएँ, विस्तार और
अनन्तता हृदय को श्रद्धा, गर्व और
२ आत्मानन्द से भर देती थीं, मानो भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त
आत्माओं को एक लड़ी में पिरोये हुए है।
(२)
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