Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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मै अभी इसी विस्मय में पड़ा हुआ था कि डिप्टी कमिश्नर ने सिर उठाया
और मेरी तरफ देखकर कहा आपने शायद मुझे पहचाना नहीं।
इतना सुनते ही मेरे स्मृति-नेत्र खुल गये, बोला आपका नाम
सूर्यप्रकाश तो नहीं है?
'जी हाँ, मै आपका वही अभागा शिष्य हूँ।'
'बारह-तेरह वर्ष हो गये।'
सूर्यप्रकाश ने मुस्कराकर कहा -- अध्यापक लड़कों को भूल जाते हैं;
पर लड़के उन्हें हमेशा याद रखते हैं।
मैने उसी विनोद के भाव से कहा -- तुम जैसे लड़कों को भूलना असम्भव
है।
सूर्यप्रकाश ने विनीत स्वर में कहा -- उन्हीं अपराधों को क्षमा
कराने के लिए सेवा में आया हूँ। मैं सदैव आपकी खबर लेता रहता था। जब
आप इंगलैंड गये, तो मैंने आपके लिए बधाई का पत्र लिखा; पर उसे भेज न
सका। जब आप प्रिंसिपल हुए, मैं इंगलैंड जाने को तैयार था। वहाँ
मै पत्रिकाओं में आपके लेख पढ़ता रहता था। जब लौटा, तो मालूम हुआ कि
आपने इस्तीफा दे दिया और कहीं देहात मे चले गये हैं। इस जिले मे आये
हुए मुझे एक वर्ष से अधिक हुआ; पर इसका जरा भी अनुमान न था कि आप
यहाँ एकान्त-सेवन कर रहे हैं। इस उजाद गाँव में आपका जी कैसे लगता
है। इतनी ही अवस्था में आपने वानप्रस्थ ले लिया?
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