Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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यह कहकर मैंने सूर्यप्रकाश के चेहरे की ओर गौर से देखा। कपट मुसकान
की जगह ग्लानि का रंग था। शायद यह दिखाने आया था कि आप जिसकी तरफ से
इतने निराश हो गये थे, वह अब इस पद को सुशोभित कर रहा है। वह मुझसे
अपने सदुद्योग का बखान चाहता था। मुझे अब अपनी भूल मालूम हुई। एक
सम्पन्न आदमी के सामने समृद्धि की निन्दा उचित नहीं। मैने तुरन्त
बात पलटकर कहा --मगर तुम अपना हाल तो कहो। तुम्हारी यह काया-पलट
कैसे हुई? तुम्हारी शरारतों को याद करता हूँ तो अब भी रोएँ खड़े हो
जाते हैं। किसी देवता के वरदान के सिवा और तो कहीं यह विभूति न
प्राप्त हो सकती थी।
सूर्यप्रकाश ने मुस्कराकर कहा -- आपका आशीर्वाद था।
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