Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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मेरे मुख से यह वाक्य उस समय कैसे निकला; इसका मुझे खुद आश्चर्य है।
इस सत्य को झुठलाना वैसा ही था जैसे दिन को रात बताना। हम दोनों ने
गुल्ली को डण्डे में जोर से लगते देखा था लेकिन गया ने मेरा कथन
स्वीकार कर लिया।
'हाँ, किसी ईंट में लग गयी हो। डण्डे में लगती, तो इतनी आवाज न आती।
मैंने फिर पदाना शुरू कर दिया। लेकिन इतनी प्रत्यक्ष धाँधली कर लेने
के बाद, गया की सरलता पर मुझे दया आने लगी; इसलिए जब तीसरी बार
गुल्ली डण्डे में लगी, ती मैंने बड़ी उदारता से दाँव देना तय किया।
गया ने कहा-अब तो अँधेरा हो गया है भैया, कल पर रखो। मैंने सोचा, कल
बहुत-सा समय होगा, यह न जाने कितनी देर पदावे, इसलिए इसी वक्त
मुआमला साफ कर लेना अच्छा होगा।
'नही, नहीं। अभी बहुत उजाला है। तुम अपना दाँव ले लो।'
'गुल्ली सूझेगी नहीं।'
'कुछ परवाह नहीं।'
गया ने पदाना शुरू किया। पर उसे अब बिलकुल अभ्यास न था। उसने दो बार
टाँड़ लगाने का इरादा किया, लेकिन दोनों ही बार हुच गया। एक मिनट से
कम में वह दाँव पूरा कर चुका। बेचारा घंटा-मर पदा; पर एक मिनट ही
में अपना दॉव खो बैठा। मैने अपने हृदय की विशालता का परिचय दिया।
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