Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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एक-एक को टोकरियों खिलौने दूँ और दिखा दूँ कि दोस्तों के साथ इस तरह
सलूक किया जाता है। यह नहीं कि एक पैसे की रेवड़ियाँ ली तो
चिढ़ा-चिढ़ाकर खाने लगे। सब-के-सब खूब हँसेंगे कि हामिद ने चिमटा
लिया है। हँसें! मेरी बला से। उसने दूकानदार से पूछा-यह चिमटा कितने
का है?
दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा-वह तुम्हारे
काम का नहीं है जी!
'बिकाऊ है कि नहीं?
'बिकाऊ क्यों नहीं है। और यहाँ क्यों लाद लाये हैं?'
'तो बताते क्यों नहीं, के पैसे का है?"
'छः पैसे लगेंगे।'
हामिद का दिल बैठ गया। 'ठीक ठीक बताओ!'
'ठीक-ठीक पाँच पैसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो।'
हामिद ने कलेजा मजबूत करके कहा-तीन पैसे लोगे?
यह कहता हुआ वह आगे बढ़ गया कि दूकानदार की घुड़कियाँ न सुने। लेकिन
दूकानदार ने घुड़कियाँ नहीं दीं। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने
उसे इस तरह कन्धे पर रखा, मानों बन्दूक है और शान से अकड़ता हुआ
संगियों के पास आया। जरा सुनें, सब-के-सब क्या क्या आलोचनाएँ करते
हैं।
मोहसिन ने हँसकर कहा-यह चिमटा क्यों लाया पगले! इसे क्या करेगा?
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