Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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इतने में दस बज गये। पुरानी सभ्यता के लोग थे। नयी रोशनी अभी केवल
पहाड़ की चोटी तक पहुँच पायी थी! अन्दर से भोजन का बुलावा आया। हम
स्नान करने चले। मैं हमेशा अपनी धोती खुद छाँट लिया करता हूँ; मगर
यहाँ मैंने ईश्वरी की ही भाँति अपनी धोती भी छोड़ दी। अपने हाथों
अपनी धोती छाँटते शर्म आ रही थी। अन्दर भोजन करने चले। होस्टल में
जूते पहने मेज पर जा डटते थे। यहाँ पाँव धोना आवश्यक था। कहार पानी
लिये खड़ा था। ईश्वरी मे पाँव बढ़ा दिये। कहार ने उसके पाँव धोये।
मैंने भी पाँव बढ़ा दिये। कहार ने मेरे पाँव भी धोये। मेरा विचार न
जाने कहाँ चला गया था।
( ४ )
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