Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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३ इमाहिम की पीठ पर घोड़े ने टाप रख दी। वह अचेत जमीन पर पड़े थे।
इन आदमियों का शोर-गुल सुनकर आप-ही-आप उनकी आँखें खुल गयीं। एक युवक
को इशारे से बुलाकर कहा-क्यों कैलाश, क्या कुछ लोग शहर से आ रहे
हैं? कैलाश ने उस बढ़ती हुई घटा की ओर देखकर कहा-जी हाँ, हजारों
आदमी हैं।
इब्राहिम-तो अब खैरियत नहीं है। झण्डा लौटा दो। हमें फौरन लौट चलना
चाहिए, नहीं तूफान मच जायगा। हमें अपने भाइयों से लड़ाई नहीं करनी
है। फौरन लौट चलो।
यह कहते हुए उन्होंने उठने की चेष्टा की, मगर उठ न सके।
इशारे की देर थी। संगठित सेना की भाँति लोग हुक्म पाते ही पीछे फिर
गये। झण्डियों के बॉसों, साफों और रूमालों से चटपट एक स्ट्रेचर
तैयार हो गया। इब्राहिम को लोगों ने उस पर लिटा दिया और पीछे फिरे;
मगर क्या वह परास्त हो गये थे?
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