Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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अमीना का दिल कचोट रहा है। गाँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा
रहे हैं। हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है! उसे कैसे अकेले
मेले जाने दे! उस भीड़-भाड़ में बच्चा कहीं खो जाय तो क्या हो!
नहीं, अमीना उसे यों न जाने देगी। नन्ही-सी जान! तीन कोस चलेगा
कैसे! पैर में छाले पड़ जायेंगे। जूते भी तो नहीं हैं। वह
थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद ले लेगी, लेकिन यहाँ सेवैयाँ कौन
पकायेगा? पैसे होते तो लौटते-लौटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना
लेती। यहाँ तो घण्टों चीजें जमा करते लगेंगे। माँगे ही का तो भरोसा
ठहरा। उस दिन फहीमन के कपड़े सिये थे। आठ आने पैसे मिले थे। उस
अठन्नी को ईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए; लेकिन कल
ग्वालन सिर पर सवार हो गयी तो क्या करती! हामिद के लिए कुछ नहीं है,
तो दो पैसे का दूध तो चाहिए ही। अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे हैं।
तीन पैसे हामिद की जेब मे, पाँच अमीना के बटवे में। यही तो बिसात है
और ईद का त्योहार!
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