Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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साहसा उसे इब्राहिम अली की वृद्धा विधवा का खयाल आया। उसने सुना था,
उनके लड़के-वाले नहीं हैं। बेचारी अकेली बैठी रो रही होंगी। कोई
तसल्ली देनेवाला भी पास न होगा। वह उनके मकान की ओर चली। पता उसने
पहले ही अपने साथ की औरतों से पूछ लिया था। वह दिल में सोचती जाती
थी-मै उनसे कैसे मिलूँगी, उनसे क्या कहूँगो, उन्हें किन शब्दो में
समझाऊँगी? इन्हीं विचारो में डूबी हुई वह इब्राहिम अली के घर पर
पहुँच गयी। मकान एक गली में था,साफ-सुथरा; लेकिन द्वार पर हसरत बरस
रही थी। उसने धड़कते हुए हृदय से अन्दर कदम रखा। सामने बरामदे में
एक खाट पर वह वृद्धा बैठी हुई थी, जिसके पति ने आज स्वाधीनता की
वेदी पर अपना बलिदान दिया था। उसके सामने सादे कपड़े पहने एक युवक
खड़ा, आखों में आँसू भरे, वृद्धा से कुछ बातें कर रहा था। मिट्ठन उस
युवक को देखकर चौंक पड़ी-वह बीरबलसिंह थे।
उसने क्रोधमय आश्चर्य से पूछा-तुम यहाँ कैसे आये?
बीरबलसिंह ने कहा-उसी तरह, जैसे तुम आयीं। अपने अपराध क्षमा कराने
आया हूँ।
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