Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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'उपाय यही है कि उस पर दोनो जनें एक साथ चोट करें। मैं आगे से
रगेदता हूँ, तुम पीछे से रगेदो, दोहरी मार पड़ेगी, तो भाग खड़ा
होगा। ज्योंही मेरी ओर झपटे तुम बगल से उसके पेट में सींग धुसेड़
देना। जान जोखिम है; पर दूसरा उपाय नहीं है।'
दोनों मित्र जान हथेलियों पर लेकर लपके। साँड़ को कभी संगठित
शत्रुओं से लड़ने का तजुरबा न था। वह तो एक शत्रु से मल्लयुद्ध करने
का आदी था। ज्योंही हीरा पर झपटा, मोती ने पीछे से दौड़ाया। साँड़
उसकी तरफ मुड़ा, तो हीरा ने रगेदा। साँड़ चाहता था कि एक एक करके
दोनों को गिरा लें। पर यह दोनों उस्ताद थे। उसे यह अवसर न देते थे।
एक बार साँड़ झल्लाकर हीरा का अन्त कर देने के लिए चला, कि मोती ने
बगल से पाकर उसके पेट में सींग भोंक दी। साँड़ क्रोध में आकर पीछे
फिरा तो हीरा ने दूसरे पहलू में सींग चुभा दिया। आखिर बेचारा जख्मी
होकर भागा, और दोनों मित्रों ने दूर तक उसका पीछा किया। यहाँ तक कि
साँड़ बेदम होकर गिर पड़ा। तब दोनों ने उसे छोड़ दिया।
दोनो मित्र विजय के नशे में झूमते चले जाते थे।
मोती ने अपनी सांकेतिक भाषा में कहा-मेरा जी चाहता था कि बचा को मार
ही डालूँ।
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