Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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मुहल्ले में भी जो दो-चार पुराने जमाने के लोग थे, वे आपस में
भाँति-भाँति के अमंगल को कल्पनाएँ करने लगे-अब खैरियस नहीं है।जन
हमारे रईसों का यह हाल है, तो मुल्क का खुदा ही हाफिज। यह बादशाहत
शतरंज के हाथों तबाह होगी। आसार बुरे हैं।
राज्य में हाहाकार मचा हुआ था। प्रजा दिन-दहाड़े लूटी जाती थी। कोई
फ़रियाद सुननेवाला न था। देहातों की सारी दौलत लखनऊ में खिंची चली
आती थी, और वह वेश्याओं में, भाँड़ों में और विला-सिता के अन्य अगों
की पूर्ति में उड़ जाती थी। अँगरेज कंपनी का ऋण दिन-दिन बढ़ता जाता
था। कमली दिन-दिन भीगकर भारी होती जाती थी। देश में सुव्यवस्था न
होने के कारण वार्षिक कर भी न वसूल होता था। रेजीडेंट बार-बार
चेतावनी देता था; पर यहाँ तो लोग विलासिता के नशे में चूर थे; किसी
के कानों पर जूं न रेंगती थी।
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