Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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मोहसिन उसकी नादानी पर दया दिखाकर बोला-अरे पागल, इन्हें कौन
पकड़ेगा? पकड़नेवाले तो यह लोग खुद हैं। लेकिन अल्लाह इन्हें सजा भी
खूब देता है। हराम का माल हराम में जाता है। थोड़े ही दिन हुए मान
के घर आग लग गयी। सारी लेई-पूँजी जल गयी। एक बरतन-तक न बचा। कई दिन
पेड़ के नीचे सोये, अल्ला कसम, पेड़ के नीचे। फिर न जाने कहाँ से
एक सौ कर्ज लाये तो बरतन-भाड़े आये।
हामिद-एक सौ तो पचास से ज्यादा होते हैं?
'कहाँ पचास, कहाँ एक सौ। पचास एक थैली-भर होता है। सौ तो दो थैलियों
में भी न आये।'
अब बस्ती घनी होने लगी थी। ईदगाह जानेवालों की टोलियाँ नजर आने
लगीं। एक-से-एक भड़कीले वस्त्र पहने हुए। कोई इक्के-ताँगे पर सवार,
कोई मोटर पर, सभी इत्र में बसे, सभी के दिलों में उमंग। ग्रामीणों
का यह छोटा-सा दल, अपनी विपन्नता से बेखबर, सन्तोष और धैर्य में मगन
चला जा रहा था। बच्चों के लिए नगर की सभी चीजें अनोखी थीं। जिस चीज
की ओर ताकते, ताकते ही रह जाते। और पीछे से बार-बार हार्न की आवाज
होने पर भी न चेतते। हामिद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा।
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