Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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'इसका तुम्हें अख्तियार है; लेकिन मेरे रुपयों में से तुम्हें कुछ न
मिल सकेगा। मेरी ज़रूरतें देखो। तुम्हारे घर में काफी जायदाद है।
तुम्हारे सिर कोई बोझ नहीं, मेरे सिर तो सारी गृहस्थी का बोझ है। दो
बहनों का विवाह है, दो भाइयों की शिक्षा है, नया मकान बनवाना है।
मैंने तो निश्चय कर लिया है कि सब रुपये सीधे बैंक में जमा कर
दूँगा। उनके सूद से काम चलाऊँगा। कुछ ऐसी शर्तें लगा दूंँगा, कि
मेरे बाद भी कोई इस रकम में हाथ न लगा सके।'
विक्रम ने सहानुभूति के भाव से कहा--हाँ, ऐसी दशा में तुमसे कुछ
माँगना अन्याय है। खैर, मैं ही तकलीफ उठा लूँगा लेकिन बैंक के सूद
की दर तो बहुत गिर गया है।
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