Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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बड़े ठाकुर साहब के मुख पर संतोष की झलक दिखायी दी। फौरन् पलंग बिछ
गया। प्रकाश उस पर लेटे। ठकुराइन पंखा झलने लगी, उनकामुख भी प्रसन्न
था। इतनी चोट खाकर दस लाख पा जाना कोई बुरासौदा न था।
छोटे ठाकुर साहब के पेट में चूहे दौड़ रहे थे। ज्योंही बड़े ठाकुर
भोजन करने गये, और ठकुराइन भी प्रकाश के लिए भोजन का प्रबंध करने
गयीं, त्योंही छोटे ठाकुर ने प्रकाश से पूछा-क्या बहुत जोर से पत्थर
मारते हैं? जोर से तो क्या मारते होंगे? प्रकाश ने उनका आशय समझकर
कहा-अरे साहब, पत्थर नहीं मारते, बमगोले मारते हैं। देव-सा तो
डोल-डौल है, और बलवान इतने हैं कि एक घुसे में शेरों का काम तमाम कर
देते हैं। कोई ऐसा वैसा आदमी हो, तो एक हो पत्थर में टें हो जाय।
कितने ही तो मर गये; मगर आज तक झक्कड़ बाबा पर मुकदमा नहीं चला। और
दो-चार पत्थर मारकर ही नहीं जाते, जब तक आप गिर न पड़ें और बेहोश न
हो जायँ, वह मारते जायेंगे; मगर रहस्य यही है कि आप जितनी ज्यादा
चोटें खायेंगे, उतने ही अपने उद्देश्य के निकट पहुँचेंगे...
प्रकाश ने ऐसा रोएँ खड़े कर देनेवाला चित्र खींचा कि छोटे ठाकुर
साहब थर्रा उठे। पत्थर खाने की हिम्मत न पड़ी।
( ४ )
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