Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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कई आदमी पढ़े-लिखे भी थे। वे आपस में अंग्रेजी राज्य की तारीफ़ करते
जा रहे थे। एक महाशय बोले-ऐसा न्याय तो किसी राज्य में नहीं देखा।
छोटे-बड़े सब बराबर। राजा भी किसी पर अन्याय करे, लो अदालत उनकी भी
गर्दन दबा देती है। दूसरे सज्जन ने समर्थन किया-अरे साहब, आप बादशाह
पर दावा कर सकते हैं। आदलत में बादशाह पर डिग्री हो जाती है।
एक आदमी, जिसकी पीठ पर बड़ा-सा गट्ठर बँधा था, कलकत्ते जा रहा था।
कहीं गठरी रखने को जगह न मिलती थी। पीठ पर बाँधे हुए था। इससे बेचैन
होकर बार-बार द्वार पर खड़ा हो जाता। मै द्वार के पास ही बैठा हुआ
था। उसका बार-बार आकर मेरे मुँह को अपनी गठरी से रगड़ना मुझे बहुत
बुरा लग रहा था। एक तो हवा यों ही कम थी, दूसरे उस गँवार का आकर
मेरे मुंह पर खड़ा हो जाना मानों मेरा गला दबाना था। मै कुछ देर तक
जब्त किये बैठा रहा। एकाएक मुझे क्रोध आ गया। मैंने उसे पकड़कर पीछे
ढकेल दिया और दो तमाचे जोर-जोर से लगाये।
उसने आँखें निकालकर कहा-क्यों मारते हो बाबूजी, हमने भी किराया दिया
है?
मैने उठकर दो-तीन तमाचे और जड़ दिये।
गाड़ी में तूफान आ गया। चारों ओर से मुझ पर बौछार पड़ने लगी।
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