Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Pagina 202 di 251
Autore: प्रेमचंद
Tempo0:00
Velocita (WPM)0.0
Precisione100.0%
Premi inizia e digita le righe esattamente. · Backspace disattivato — continua anche dopo un errore.
महादेव दीपक के पास गया तो उसे एक कलसा रखा हुआ मिला। मोरचे से काला
हो रहा था। महादेव का हृदय उछलने लगा। उसने कलसे में हाथ डाला, तो
मोहरे थी। उसने एक मोहर बाहर निकाली और दीपक के उजाले में देखा; हाँ
मोहरें थी। उसने तुरन्त कलसा उठा लिया, दीपक बुझा दिया और पेड़ के
नीचे छिपकर बैठ रहा। साह से चोर बन गया।
उसे फिर शंका हुई, ऐसा न हो, चोर लौट आयें, और मुझे अकेला देखकर
मोहरे छीन लें। उसने कुछ मोहरे कमर में बाँधी, फिर एक सूखी लकड़ी से
जमीन की मिट्टी हटाकर कई गड्ढे बनाये, उन्हें मोहरों से भरकर मिट्टी
से ढंक दिया।
( ४ )
Premi inizia e digita le righe esattamente.
Non iniziato